कुम्हड़ा (pumpkin) ki kheti hindi mein

कुम्हड़ा/कद्दू की खेती

कद्दू पोषक तत्वों से भरा हुआ एक ऐसी सब्जी है जिसे बहुत नामों से जाना जाता है जैसे - कुम्हड़ा सीताफल काशीफल पंपकिन जैसे नामों से जाना जाता है यह एक ऐसी सब्जी है जिसको बिना स्टोरेज के बहुत दिनों तक घर में रखा जा सकता है इसका उपयोग शादी ब्याह में बहुत अधिक होता है कद्दू की खेती आज के दिन में बहुत से किसानों मुख्य खेती के रूप में करते हैं इसकी खेती में बाकी सब्जियों की अपेक्षा लागत बहुत कम लगती है इसमें कैल्शियम ,मैग्नीशियम ,फास्फोरस, आयरन, जिंक बहुत से तत्व पाए जाते हैं कुम्हड़ा के पके हुए पलों को कई महीनों तक अपने घर में आसानी से रखा जा सकता है इसकी खेती भारत के लगभग सभी राज्यों में बहुत आसानी से की जाती है !
कुम्हड़ा (pumpkin) ki kheti hindi mein
कुम्हड़ा (pumpkin) ki kheti hindi mein

जलवायु तथा भूमि की तयारी खाद एवं उर्वरक

कुम्हड़ा खेती के लिए उचित जल निकास वाली हल्की मिट्टी जिसका पीएच मान 6.0 से 7.0 हो अच्छा माना जाता है यह पाला सहन नहीं कर पाती है इसलिय इसकी खेती के लिए गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है 18 से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान कुम्हड़ा की खेती के लिए है उपयुक होता है खेत तैयार करने के लिए कल्टीवेटरसे 2 से 3 जुताई करते समय पाटा लगा देना चाहिए इससे मिट्टी भुरभुरी हो जाए और खेत की अंतिम जुताई करते समय प्रति एकड़ 20 कुंटल गोबर की सड़ी हुई खाद, 80 किलो यूरिया,60 किलो पोटाश एवं 60 किलो फास्फोरस,यूरिया की मात्रा तथा पोटाश और फास्फोरस की पूरी मात्रा मिला देना चाहिए तथा यूरिया की शेष बची हुई मात्रा को दो बार में बुआई के 30 दिन था 45 दिन के बाद पौधों के पास देना चाहिए !

उन्नतशील प्रजातियाँ

काशी धवल,काशी हरित, पूसा विकाश, काशी उज्जवल,अर्का चंदन, सी एस14, अर्का सूर्यमुखी, PNR, सी ओ 1,सी ओ 2 बहुत से पम्पकिन की किस्म होती हैं लेकिन अच्छी फसल एवं गुणवत्ता के लिए अपने क्षेत्र में चुने गए बीजों का उपयोग करना चाहिए !

बीज उपचार

बीजों की बुआई करने से पहले 2 ग्राम बाविस्टिन से बीजों का उपचार कर देना चाहिए इससे पौधों में रोग लगने की संभावना कम हो जाती है !

 बुआई का समय एवं विधि

कुम्हड़ा की खेती वर्ष में दो बार मैदानी क्षेत्रों में पाला खत्म होने के बाद जनवरी-फरवरी महीने तथा जून - जुलाई के महीने में की जाती है ! तैयार होने के बाद इसकी बुवाई करने के लिए कतार से कतार की दूरी 3.5 मीटर बना लेनी चाहिए और नालियों पर 1 फीट की दूरी पर बीजों बुवाई करनी चाहिए !

सिचाई एवं निराई-गुड़ाई

गर्मियों के मौसम में 3 से 4 दिन के अंतराल पर तथा वर्षा काल में मौसम को देखते हुए सिंचाई करनी चाहिए और समय-समय पर खरपतवार को खुरपी की सहायता से निकाल देना !

रोग तथा नियंत्रण

कुम्हड़ा की खेती में मुख्य रूप से फफूंद नाशक रोग, मोजैक वायरस,फल बेधक,सफ़ेद मक्खी जैसे रोग लगते है !
फफूंद नाशक रोग - इस रोग के नियंत्रण के लिए dythen M 45 या बाविस्टीन का प्रयोग करना चाहिए!मोजैक वायरस - इस रोग से निजात पाने के लिए सबसे अच्छा उपाय यह है की रोगग्रस्त पेड़ को उखाड़कर जमीन में गाड़ दिया जाए !फल बेधक - इस रोग के नियंत्रण के लिए जम्बा 5ml 15 लीटर पानी में उपयोग करना चाहिए !सफ़ेद मक्खी - इसके नियंत्रण के लिए कॉन्फिडोर या कांटेपहाइड्रोक्लोराइड का प्रयोग करना चाहिए !
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